ALL ब्रेकिंग क्षेत्रीय राज्य देश विदेश राजनीति मनोरंजन स्वास्थ्य
दत्तीगांव की उम्मीदवारी ने भगवा गढ़ रहे बदनावर का राजनीतिक रसायन गड़बड़ाया
June 6, 2020 • मिलिंद मजूमदार महू • राजनीति

- 1957 में विधानसभा सीट अस्तित्व में आने के बाद से हुए 13 में से 7 चुनाव में जनसंघ और भाजपा के उम्मीदवार विजयी रहे हैं बदनावर से

- अधिकतर बाहरी प्रत्याशी ही विजयी रहे हैं बदनावर से, राजपूत और पाटीदार मतदाताओं की संख्या करीब-करीब बराबर, आदिवासी भी बहुतायत में

इंदौर/धार, 5 जून। धार जिले की बदनावर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल की राजनीति पर गहरा असर डालने वाला माना जा रहा है। 1957 से जब से यह सीट अस्तित्व में आई है 13 में से 7 बार यहां से भारतीय जनसंघ और भाजपा का उम्मीदवार विजयी रहा है, लेकिन राजवर्धन सिंह दत्तीगांव की लगभग तय जैसी उम्मीदवारी ने इस सीट का राजनीतिक रसायन गड़बड़ा दिया है। बदनावर और सरदारपुर विधानसभा सीट के संघ परिवारी करीब तीन दशक से दत्तीगांव परिवार से राजनीतिक संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में कांग्रेस की ओर से तीन बार विधायक रहे राजवर्धन प्रेम सिंह दत्तीगांव की भाजपा उम्मीदवारी से भगवा परिवार का कैडर असहज महसूस कर रहा है। अन्य जिलों की अपेक्षा धार जिले में कांग्रेस में पार्टी के अंतर्गत गुटीय संघर्ष अधिक तीव्र और कर्कश रहा है। कांग्रेसी सूत्रों के अनुसार पार्टी को यहां से दमदार प्रत्याशी की तलाश है। ऐसे में जिला कांग्रेस अध्यक्ष बालमुकुंद सिंह गौतम के अनुज मनोज गौतम, स्वर्गीय अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में संसदीय सचिव रहे दबंग नेता स्वर्गीय मोहन सिंह बुंदेला के पुत्र कुलदीप बुंदेला और 2018 के चुनाव में निर्दलीय के तौर पर 30 हजार वोट प्राप्त करने वाले राजेश अग्रवाल कांग्रेस की ओर से प्रमुख दावेदार के रूप में उभरे हैं। राजेश अग्रवाल पुराने संघी हैं तथा हिंदू जागरण मंच से जुड़े रहें हैं। 46 वर्षीय राजवर्धन सिंह दत्तीगांव नई दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएट हैं तथा लुफ्थांसा एयरलाइंस में मार्केटिंग मैनेजर के पद से त्यागपत्र देकर राजनीति में उतरे हैं। उनके पिता स्वर्गीय प्रेम सिंह दत्तीगांव, स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के कट्टर समर्थक थे जबकि राजवर्धन सिंह ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना नेता मानते हैं।भाजपा पहले ही ऐलान कर चुकी है कि श्री सिंधिया के साथ भाजपा में आए सभी तत्कालीन विधायकों को फिर से टिकट दिया जाएगा।

 

राजपूत और पाटीदार समाज का वर्चस्व है...... 

आदिवासियों के लगभग 60 हजार मतदाताओं को छोड़ दें तो इस सीट पर राजपूत और पाटीदार मतदाताओं का वर्चस्व है। राजपूत और पाटीदार मतदाताओं की संख्या करीब 30- 30 हजार है। राजपूत समाज बंटा हुआ है जबकि पाटीदार समाज के बहुसंख्यक मतदाता संघ परिवार के परंपरागत समर्थक माने जाते हैं। आदिवासियों में यहां भील समाज के मतदाताओं की संख्या अधिक है। भील समाज कांग्रेस का परंपरागत समर्थक वर्ग माना जाता है। भाजपा की ओर से खेमराज पाटीदार 1998 की कांग्रेस लहर में यहां से निर्वाचित हो चुके हैं। 

 

यह है बदनावर सीट का इतिहास...... 

1956 में मध्य प्रदेश की स्थापना के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव यानी 1957 में यहां से कांग्रेस के मनोहर सिंह मेहता विधायक चुने गए, जो इंदौर के मूल निवासी थे। 1962 और 67 में यहां से भारतीय जनसंघ के टिकट पर गोवर्धन लाल शर्मा जीते वह भी बाहरी प्रत्याशी थे। 1972 में कांग्रेस के चिरंजीलाल जीते। जबकि 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर फिर से जनसंघ घटक के गोवर्धन शर्मा विजयी हुए। 1980 में कांग्रेस के रघुनाथ सिंह, 1985 की कांग्रेस लहर में भाजपा के रमेश चंद्र सिंह राठौर बट्टू बना, 1990 में प्रेम सिंह दत्तीगांव, 1993 में फिर से रमेश चंद्र सिंह राठौर गट्टू बना भाजपा के टिकट पर, 1998 भाजपा के ही खेमराज पाटीदार, 2003 2008 और 2018 में कांग्रेस के टिकट पर स्वर्गीय प्रेम सिंह दत्तीगांव के पुत्र राजवर्धन सिंह दत्तीगांव जबकि 2013 के चुनाव में इंदौर क्षेत्र क्रमांक 5 से विधायक रहे भाजपा के बड़े सरकारी नेता भंवर सिंह शेखावत यहां से विजयी रहे थे।