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गुमनाम महान वैज्ञानिक और अनुसंधान कर्ता डॉ शंभूनाथ डे को समर्पित संकलन
May 20, 2020 • Rajesh Jauhri • देश विदेश

गुमनाम नायक सन 1817

1817 में विश्व में एक नई बीमारी ने दस्तक दी। 

नाम था "ब्लू डेथ" 

ब्लू डेथ यानि "कॉलेरा" जिसे हिंदुस्तान में एक नया नाम दिया गया........"हैजा"।

 

हैजा विश्व भर में मौत का तांडव करने लगा और इसकी चपेट में आकर कर उस समय लगभग 1,80,00,000(एक करोड़ अस्सी लाख) लोगों की मौत हो गयी। दुनिया भर के वैज्ञानिक हैजा का ईलाज खोजने में जुट गये। 

 

"सन 1844"

 

रॉबर्ट कॉख नामक वैज्ञानिक ने उस जीवाणु का पता लगाया जिसकी वजह से हैजा होता है और उस जीवाणु को नाम दिया वाइब्रियो कॉलेरी। 

रॉबर्ट कॉख ने जीवाणु का पता तो लगा लिया लेकिन वह यह पता लगाने में नाकाम रहे के वाइब्रियो कॉलेरी को कैसे निष्क्रिय किया जा सकता है। 

 

हैज़ा फैलता रहा ........लोग मरते रहे और इस जानलेवा बीमारी को ब्लू डेथ यानि "नीली मौत" का नाम दे दिया गया। 

 

"1 फरवरी 1915"

 

पश्चिम बंगाल के एक दरिद्र परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया "शंभूनाथ"। शुरुआत से ही शंभूनाथ पढ़ाई में अव्वल रहे। कोलकाता मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया। डॉक्टरी से अधिक उनका रुझान "रिसर्च" की ओर था। इसलिये 1947 में उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कैमरोन लैब में पीएचडी में दाखिला लिया। मानव शरीर की संरचना पर शोध करते समय शंभूनाथ डे का ध्यान हैज़ा फैलाने वाले जीवाणु वाइब्रियो कॉलेरी की ओर गया। 

 

1949 

 

माटी का प्यार शंभूनाथ डे को वापिस हिंदुस्तान खींच लाया। उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया और वह महामारी का रूप ले चुके हैज़े का ईलाज ढूंढने में जुट गये। 

बंगाल उस समय हैज़े के कहर से कांप उठा था। हॉस्पिटल हैजे के मरीजों से भरे हुये थे। 

 

1844 में रॉबर्ट कॉक के शोध के अनुसार जीवाणु व्यक्ति के सर्कुलेटरी सिस्टम यानी कि खून में जाकर उसे प्रभावित करता है। दरअसल यहीं पर रॉबर्ट कॉख ने गलती की, उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि यह जीवाणु व्यक्ति के किसी और अंग के ज़रिए शरीर में जहर फैला सकता है।

 

शंभूनाथ डे ने अपने शोध के निष्कर्ष से विश्व भर में सनसनी फैला दी। शंभूनाथ के शोध से पता चला वाइब्रियो कॉलेरी खून के रास्ते नहीं बल्कि छोटी आंत में जाकर एक टोक्सिन/जहरीला पदार्थ छोड़ता है।इसकी वजह से इंसान के शरीर में खून गाढ़ा होने लगता है और पानी की कमी होने लगती है।

 

1953

शंभूनाथ डे का शोध प्रकाशित के पश्चात ही ऑरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) को बनाया गया। यह सॉल्यूशन हैजे का रामबाण इलाज साबित हुआ। हिंदुस्तान और अफ्रीका में इस सॉल्यूशन के जरिये लाखों मरीजों को मौत के मुँह से निकाल लिया गया। 

 

विश्व भर में शंभूनाथ डे के शोध का डंका बज चुका था। परंतु उनका दुर्भाग्य था के वह शोध भारत भूमि पर हुआ था। लाखों करोड़ों लोगों को जीवनदान देने वाले शंभूनाथ को अपने ही राष्ट्र में सम्मान नहीं मिला। 

 

शंभूनाथ आगे इस जीवाणु पर और शोध करना चाहते थे लेकिन भारत में साधनों की कमी के चलते नहीं कर पाये। 

 

उनका नाम एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी दिया गया। इसके अलावा, उन्हें दुनिया भर में सम्मानों से नवाज़ा गया लेकिन भारत में वह एक गुमनाम शख्स की ज़िंदगी जीते रहे। 

 

शंभूनाथ की रिसर्च ने ब्लू डेथ के आगे से डेथ(मृत्यु) शब्द को हटा दिया। करोड़ों लोगों की जान बच गयी। इतनी बड़ी उपलब्धि के पश्चात भी वह "राष्ट्रीय नायक" ना बन सके। ना किसी सम्मान से नवाजे गये। ना सरकार ने सुध ली। 

 

यही नहीं करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाने वाले इस राष्ट्रनायक के विषय में हमें पढ़ाया तक नहीं गया। 

अब ये मत पुछना किस सरकार ने

 

हमें अपने असली नायकों को पहचाना होगा। उन्हें सम्मान देना होगा। 

 

"गुमनाम नायक".......यह श्रृंखला नहीं ......हिंदुस्तान के रियल लाइफ़ हीरोज़ से रूबरू करवाने का एक प्रयास ह। 

 

जय हिंद

Courtesy Prakash Moghe Sir

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From Wikipedia....

 

De made significant contributions to our recent understanding of cholera and related diarrhoeal diseases and set a permanent milestone in the modern view of diseases caused by bacterial exotoxins. Followed by the discovery of Vibrio cholerae in 1884 by Robert Koch, many works have been carried out all over the world to answer many questions related with its pathogenesis and mode of transmission in causing outbreaks. The seminal works of De in Calcutta (now, Kolkata), during 1950–60 breached several qualms pertaining to the enteric toxin produced by bacteria including V. cholerae and Escherichia coli. Three of his works viz., ligated intestinal loop method (which was a reinvention of Violle and Crendiropoulo method in 1915, but De was unaware of this work and made an independent discovery) for studying cholera in rabbit model;[4] ileal loop model to demonstrate the association of some strains of E. coli with diarrhoea[5] and lastly but most importantly is his discovery of cholera toxin in 1959 in the cell-free culture filtrate of V. cholerae that stimulated a specific cellular response.[6]

 

Says Eugene Garfield,[7] founder-editor of Current Contents and Science Citation Index and publisher of The Scientist, in his 1986 tribute to De: In 1959 De was the first to demonstrate that cholera bacteria secrete enterotoxin. This discovery eventually promoted research to find a treatment aimed directly at neutralising the cholera enterotoxin. De’s paper “Enterotoxicity of bacteria-free culture-filtrate of Vibrio cholerae,” while initially unrecognised, today is considered a milestone in the history of cholera research. Biochemist W.E. van Heyningen, professor emeritus, University of Oxford, UK, and John R. Seal, former scientific director, National Institute of Allergy and Infectious Diseases, Bethesda, note that De’s paper “deserves to go down as a classic in the history of cholera, and, indeed, as later developments have shown, in the history of cellular physiology and biochemistry.” Thanks to De’s discovery of the cholera enterotoxin, research has been redirected to find a vaccine that will spark the immune system to fight the enterotoxin specifically, rather than the bacteria.

 

De and colleagues also published highly cited pioneering studies on V.cholerae action on the intestinal membrane.[4],[5],[8] The 1953 paper “An experimental study of the mechanism of action of Vibrio cholerae on the intestinal mucous membrane”[4] is De’s most-cited paper, cited 340 times until August 1986. De’s most-cited paper has been core to cholera research fronts for many years, especially research fronts on "E. coli and Vibrio cholerae enterotoxin: detection, characterization, and role of adherence" and "Characterization of cholera enterotoxin and other enterotoxins". As noted by John Craig, State University of New York Health Science Center at Brooklyn, De’s work was truly creative and novel, and it “forever altered our concepts surrounding the pathogenesis of secretory diarrhoea.”

 

These famous findings came out from the work he carried out at the Nilratan Sircar Medical College, Calcutta Medical College and Bose Institute, Kolkata in extremely modest laboratory settings. Using research methodology that was very simple, easy to perform and inexpensive, he set the highest standards of excellence in novel experimental design and execution.

 

In the words of Nobel Laureate Prof. Joshua Lederberg, “De’s clinical observations led him to the bold thought that dehydration was a sufficient cause of pathology of cholera, that the cholera toxin can kill ‘merely’ by stimulating the secretion of water into the bowel". Thus, the oral rehydration therapy (ORT) for replenishing the massive fluid loss in cholera patients, has saved innumerable lives, should be considered as a direct outcome of De's discovery of cholera toxin. His findings on exotoxins set the stage for the modern views of diseases caused by toxin producing bacteria, helped in the purification of cholera and heat-labile (LT) enterotoxins produced by V. cholerae and E. coli, respectively, and in the development of series of cholera and enterotoxigenic E. coli (in short ETEC strains) vaccines.