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मालवा निमाड़ के एक दर्जन विधायकों के टूटने के संकेत* *अलग-अलग कारणों से नाराज विधायक जा सकते हैं सिंधिया के साथ
March 13, 2020 • Rajesh Jauhri • राजनीति

इंदौर, प्रदीप जोशी।* जिस गर्मजोशी के साथ भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगवानी की और उनकी शान में पलक-पावड़े बिछा दिए, उससे स्पष्ट हो गया कि पटकथा आजकल की नहीं है, बल्कि कई दिनों से इसकी तैयारी की जा रही थी। मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके थिंक टैंक दिग्विजयसिंह सहित पूरी पार्टी को इस बात की भनक भी नहीं लगी। बहरहाल, इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस न केवल ग्वालियर-चंबल संभाग में कमजोर हुई है, बल्कि मालवा-निमाड़ में भी उसे खासा नुकसान हो रहा है। सूबे के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों के टूटने का संकेत मिल रहा है। ये विधायक दिग्विजयसिंह और अरुण यादव से नाराज चल रहे हैं और बदले हालात में उन्हें सिंधिया के साथ जाना ज्यादा मुफीद लग रहा है। गौरतलब है कि सरकार को समर्थन देने वाले सूबे के तीन निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री की वादाखिलाफी से नाराज हैं। यानी सियासी खेल को इस रूप में समझा जा सकता है कि जिस मालवा-निमाड़ ने कांग्रेस की सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया, वहीं से कांग्रेस को पटखनी मिलती नजर आ रही है।

*निर्दलीय विधायकों पर भाजपा की नजर*
ज्योतिरादित्य सिंधिया का मालवा-निमाड़ में खासा दबदबा है। कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामने के बाद उनके साथ तुलसी सिलावट, मनोज चौधरी, राजवर्धनसिंह दत्तीगांव और हरदीपसिंह डंग ने भी तत्काल पार्टी से नाता तोड़ लिया। कुल 22 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ने के कारण सरकार का गिरना तय माना जा रहा है, पर सियासी समीकरण कुछ और संकेत दे रहे हैं। भाजपा और सिंधिया की नजर उन विधायकों पर है, जिनकी सरकार और नेताओं से नाराजी चल रही है। इनमें तीन निर्दलीय विधायकों के नाम अहम हैं, जिन्हें मंत्री बनाए जाने का आश्वासन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिया था।

*किसके साथ रहेंगे निर्दलीय विधायक*
*सुरेंद्रसिंह शेरा -* बुरहानपुर से विधायक ठाकुर सुरेंद्रसिंह शेरा भैया मुख्यमंत्री की वादाखिलाफी से खासे नाराज हैं। वे तो सिंधिया कैंप तक पहुंच भी गए थे, मगर बाद में मान गए। ताजा घटनाक्रम के बाद से वे चुप्पी साधे हुए हैं।
*केदार डावर -* भगवानपुरा सीट निर्दलीय जीतने वाले केदार पटेल का टिकट अरुण यादव की वजह से नहीं हुआ था। मंत्री बनने की उम्मीद में वे कांग्रेस के साथ थे, मगर उनकी उम्मीद अभी तक पूरी नहीं हुई।
*विक्रमसिंह राणा -* सुसनेर सीट से कांग्रेस के टिकट के प्रबल दावेदार गुड्डू भैया का पत्ता दिग्विजय सिंह ने कटवा दिया था। नाराज होकर उन्होंने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते भी। वे भी मंत्री बनने की आस में थे, मगर यहां भी सिंह ने अड़ंगा अटका दिया। 
 
*विधायक और उनकी नाराजी के कारण*
*संजय शुक्ला -* इंदौर-1 से विधायक संजय शुक्ला की आस्था सुरेश पचौरी के साथ है। फिलहाल वे जयपुर में ही कांग्रेस विधायकों के साथ मौजूद हैं। राज्यसभा के लिए दिग्विजय के नामांकन के बाद से नाराज पचौरी अगर कोई फैसला लेंगे तो शुक्ला उन्हीं के साथ जाएंगे।
*रवि जोशी -* अरुण यादव के विरोधियों में शुमार रवि जोशी की नाराजी चुनाव जीतने का बाद भी कम नहीं हुई है। यादव के हस्तक्षेप की कई बार वे पार्टी में नाराजी व्यक्त कर चुके हैं। पिछले चुनाव की हार का कारण भी वे यादव को ही मानते हैं।
*उमंग सिंघार -* गंधवानी से चुनाव जीते उमंग सिंघार फिलहाल प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। दिग्विजय सिंह के सरकार में हस्तक्षेप से दुखी सिंघार, सिंह के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल चुके हैं। यहां तक कि उन्होंने सीधे आलाकमान को सिंह की शिकायत की थी।
*सुमित्रादेवी कासडेकर -* नेपानगर से चुनाव जीतने वाली सुमित्रादेवी कासडेकर वैसे तो सुभाष यादव खेमे की ही मानी जाती हैं, मगर जिस तरह से अरुण यादव और सचिन यादव का हस्तक्षेप बढ़ रहा है, उससे इनके सहित सभी पुराने नेता नाराज हैं।
*झूमा सोलंकी -* भीकनगांव से विधायक चुनी गर्इं झूमा सोलंकी की नाराजी भी अरुण और सचिन यादव को लेकर है। हर काम में हस्तक्षेप से नाराज सोलंकी अपनी सीट और राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए निष्ठा बदल सकती हैं।
*ग्यारसीलाल रावत -* अंचल के कद्दावर नेता ग्यारसीलाल रावत का मुंह सरकार बनने के बाद से फूला हुआ है। कारण सरकार और संगठन दोनों में ही उन्हें कोई खास महत्व मिल नहीं रहा। ऐसे में मंत्रियों द्वारा की जा रही उपेक्षा ने उनकी नाराज और बढ़ा दी है।
*प्रताप ग्रेवाल -* सरदारपुर से विधायक प्रताप ग्रेवाल भी आदिवासी अंचल का बड़ा नाम है। तमाम नेताओं के बीच स्वयं को उपेक्षित महसूस करने वाले ग्रेवाल कई बार अपनी नाराजी संगठन के सामने जता चुके हैं। बदले हालात में उन पर भी सबकी नजरें जमी हुई हैं।
*डॉ. हीरालाल अलावा -* जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के प्रमुख चुनाव के ऐन पहले कांग्रेस में शामिल हुए थे। कुक्षी सीट से टिकट नहीं मिलने और मंत्री नहीं बनाए जाने से नाराज डॉ. अलावा कई बार सरकार को घेरे में ले चुके हैं। अब कोई और फैसला कर लें, इसमें कोई संदेह नहीं है। 

साभार: प्रदीप जोशी